संदेश

अटूट विश्वास

चित्र
 ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास...... एक आस्तिक(जो ईश्वर को मानते है ) और दुसरे नास्तिक(जो ईश्वर को नहीं मानते है।) अगर देखा जाये तो दुनिया में दो प्रकार के लोग होते है – नास्तिक होना भी तब तक बुरा नही है जब तक कि आप दुसरे की भावनाओं को ठेस ना पहुचायें। आस्तिक लोगों में एक अलग ही प्रकार की शक्ति होती है, जिसे श्रृद्धा और विश्वास की शक्ति कहा जा सकता है। फिर चाहे वो किसी भी ईश्वर, मजहब या देवी – देवता को मानते हो । अगर आपके पास ईश्वर विश्वास की ताकत है तो आप इस दुनिया के सबसे खुशहाल व्यक्ति हो सकते है। क्योंकि जिसको ईश्वर में विश्वास होता है, उसी को ईश्वर की प्रेरणा होती है । इसे हम एक छोटी सी कहानी से समझेंगे – समझे आत्मा का संकेत – जो की ईश्वर की प्रेरणा है। एक बार एक बूढी माता माथे पर कपड़े व गहनों की गठरी और साथ में छोटी सी बेटी को लेकर एक गाँव से दुसरे गाँव जा रही थी। चलते चलते वह कुछ ही दूर पहुँची होगी कि पीछे से एक घुड़सवार आया। घुड़सवार को अकेला देख बूढी माता ख़ुशी से बोली – “ बेटा ! आज बहुत धुप है और गर्मी भी बहुत है, यदि तुझे कोई आपत्ति ना हो तो इस गठरी और मेरी बेटी को अपने घोड़े ...

मातृशक्ति

चित्र
 मातृशक्ति सब कुछ कर सकती है.....        आज देहरादून वापसी थी, ट्रेन का टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया, फिर बस से जाने का फैसला लिया, घर से स्टेशन के लिये निकल रहा था तो कटघरिया चौराहे पर पहुँच कर अँधेरे में एक ऑटो दिखा और ऑटो के अंदर ड्राइविंग सीट पर एक महिला थी।        पहले मुझे भी अजीब लगा और सोचा शायद ऐसे ही बैठी होंगी। मैं ऑटो की प्रतीक्षा कर रहा था तब तक एक आवाज आई, भैया बाजार चलना है....मैंने हाँ में हामी भरी लेकिन मैंने उत्सुकतावस पूछा कि आप ऑटो चलाओगे?         पूरे हल्द्वानी में भावना जी इकलौती महिला हैं जो ऑटो चलाती हैं, बाकी और महिलाएं भी हैं(जैसा उन्होंने बताया) जो टुक टुक चलाती हैं। भावना जी ने बोला हाँ, मैं ही चलाती हूँ, मेरे लिये थोड़ी देर के लिये अजीब था लेकिन ज्यादा आश्चर्यजनक नहीं...         क्योंकि आजकल महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आकर काम कर रही हैं....और घर परिवार की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रही हैं।         खैर कटघरिया चौराहे से बस स्टेशन का सफर तकरीबन 25 मिनट का रहा ज...

गुड़िया और चप्पल

चित्र
 "ये कितने की है लखन....?    " बस डेढ़ सौ की, लेकिन आपको तीस औऱ कम कर दूँगा...ले लीजिए ।"     "ठीक है , ठीक है, फ़िर दे दो...बहुत दिनों से इस घिसी चप्पल के भरोसे चल रहा हूँ ।"  पांव में फफोले उभर आये है, लाओ यहीं पहन लेता हूं,  वो सज्जन मन ही मन मुस्करा दिए। उनका अंदाज सही निकला था। बाज़ार के लिए वे अपने घर से एक सौ पचास ही लेकर चले थे, क्योंकि इससे ज़्यादा उनके पास कुछ था भी नहीं, आज बढ़िया सी चप्पलें ले कर ही आयेगे यह सोचकर।    दुकानदार लखन ने चप्पल को डब्बे से निकाल बाहर रख दिया, लीजिए तभी अचानक उस सज्जन की नजर सामने की शेल्फ पर पड़ी। वहाँ रंग -बिरंगे खिलौनों का ढेर लगा हुआ था। उनकी आँखों में बिजली की भांती नन्ही मीतू का चेहरा घूम गया। कितनी उदास थी वो सुबह  "क्यों डब्बू , यह गुड़िया कितने की है?"     "भैया जी , आपसे क्या ज्यादा लूँगा ?? यह सौ की है ,आप अस्सी दे देना। यह सजावट वाली वाली दो सौ की है, बोनी का टैम है डेढ़ सौ दे देना।  आवाज़ भी करती है।" पों पों पों पों.....उसने गुड़िया बजाकर उस सज्जन को दिखा भी दिया ।   वाह बि...

मैं धीरे-धीरे सीख रही हूं

चित्र
 मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...  मुझे हर उस बात पर प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, जो मुझे चिंतित करती है। मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि... जिन्होंने मुझे चोट दी है,  मुझे उन्हें चोट नहीं देनी है। मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि... शायद सबसे बड़ी समझदारी का लक्षण भिड़ जाने के बजाय अलग हट जाने में है। मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि... अपने साथ हुए प्रत्येक बुरे बर्ताव पर प्रतिक्रिया करने में,  आपकी जो ऊर्जा खर्च होती है, वह आपको खाली कर देती है और आपको दूसरी अच्छी चीजों को देखने से रोक रही है। मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि... मैं हर आदमी से वैसा व्यवहार नहीं पा सकूंगी, जिसकी मैं अपेक्षा करती हूँ। मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि... किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना, समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है। मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि...  जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझती हूँ। मैं धीरे-धीरे सीख रही हूँ कि... कभी-कभी कुछ नहीं कहना  सब कुछ बोल देता ...

नई राह

चित्र
  ऐसा हमारे साथ कई बार होता है कि हम किसी के लिए कुछ कर सकते हैं लेकिन फिर भी हम उन बातों पर ध्यान नहीं देते और जब दूसरे करते हैं तो हमें लगता है यह हम भी तो कर सकते थे।             रवि क्या तुम्हारे पास 100 रुपये हैं?कुछ दिनों के लिये उधार चाहिये।क्या दोगे?        झूठ नही बोलूंगा सुधीर,रुपये तो मेरे पास 150 है,पर इनसे मुझे स्कूल के बाद घर सामान लेकर जाना है।       प्लीज रवि तुम 100 रुपये मुझे दे दो,आज ही चाहिये,घर पर कोई बहाना बना देना।        अरे क्या जूते पडवाओगे?फिर मैं झूठ क्यों बोलूं?वैसे तुम्हे इतनी क्या जरूरत पड़ गयी,जो तुम मुझे भी घर झूठ तक बोलने को कह रहे हो?       रवि किसी से कहना नही,वो जो अपनी कक्षा में वीर सिंह अपना सहपाठी है ना,बहुत गरीब परिवार से है।आज परीक्षा के लिये रोल नंबर मिलने है,फीस बकाया होने के कारण बड़े बाबू द्वारा उसे रोल नंबर देने से मना कर दिया है।मैं अपना रोल नंबर लेने गया था,तब मैंने बा...

मुझे मीठा पसंद नहीं

चित्र
 मुझे मीठा पसंद नही.. नए शहर में व्यवस्थित होना तभी पूर्ण माना जाता है जब अच्छी कामवाली मिल जाए. सोनल की तलाश भी आख़िरकार पूरी हो ही गई. घर की साफ़-सफ़ाई और बर्तन के लिए उसने चंदा को रख लिया. कम बोलनेवाली साफ़-सुथरी चंदा का काम बढ़िया था. आज तक उसे कभी भी टोकने की ज़रूरत नहीं पड़ी. बस उसकी एक ही आदत सोनल को अखर जाती थी. वह जब भी उसे खाने-पीने को कुछ देती वह न खाने का कोई न कोई बहाना बनाकर उसे पर सरका देती. कभी कहती, "दीदी, छाला है मुंह में… कुछ निगला नहीं जा रहा…" कभी यूं ही बिना कुछ कहे खाने की वस्तु छोड़ जाती. दूसरे दिन पूछने पर चौंककर कहती, "अरे भूल गई थी खाना…" सोनल कभी सामने ही खाने को इसरार करती, तो वह साफ़ मना कर देती, "बहुत जल्दी में हूं दीदी…" कभी-कभी तो सीधे ही, "न दीदी मन नहीं, मीठा मुझे पसंद नहीं…" हां, मीठी चाय के लिए उसकी कभी 'न' नहीं होती, पर साथ में मठरी या नमकीन प्लेट में निकालकर दो, तो एक बार भर नज़र देखकर बोलेगी, "खाली चाय ही दो दीदी, अभी तो खा नहीं पाऊंगी." चंदा के व्यवहार का विश्लेषण आज सोनल इसलिए भी कर रही थी, क्योंक...

झांसे में आना

चित्र
 दिनभर का थका-हारा अविनाश डिनर करके अपने बेडरूम में जाकर लेट ही रहा था कि पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला उसका बेटा मनु आकर पूछा," पापा...आपने मुहावरे पढ़े हैं?"    " हाँ-हाँ, क्यों नहीं।" थके हुए होने के बाद भी उसके स्वर में उत्साह था।     " तो पापा  ' झाँसे में आना ' का क्या अर्थ है?" अपनी काॅपी खोलकर मनु ने पूछा।    " वेरी सिम्पल बेटा..., धोखा में आना।"   " अच्छा पापा..., आप कभी झाँसे में आये हैं?" मनु ने पूछा तो अविनाश दीवार पर टँगी अपने माता-पिता की तस्वीर देखकर धीरे-से बोला, " हाँ....बहुत बार...।" और वह सोचने लगा, बचपन में जब वह दूध पीने में आना-कानी करता था तो माँ उसे प्यार-से कहती," मेरा राजा बेटा..., एक घूँट में दूध खत्म कर लेगा तो वह जल्दी-से बड़ा हो जाएगा।" इस झाँसे में आकर वह माँ के हाथों से न जाने कितने गिलास दूध पी गया था।बाबा तो अक्सर ही उसे ' बस थोड़ी दूर और ' कहकर उससे दौड़ लगवा लेते थें।तब उसे बाबा पर बहुत गुस्सा आता था लेकिन फिर जब स्कूल के दौड़-रेस में प्रथम आया तब बाबा पर उसे बहुत प्...