पश्चाताप


 नवरात्रि विशेष


 पश्चाताप ~~~


"ये फ़ूल नारियल का पैकेट कितने का होगा माजी..?" निधि ने महामाया मंदिर के सामने नारियल प्रसाद वाली महिला से पूछा..


" जी ये इक्यावन का...ये एक सौ एक का...और ये बड़ी चूनर के साथ एक सौ इक्यावन का !" दुकान वाली महिला ने कहा.... 


" सस्ते मस्ते सामान रख कर पूजा के सामान में भी ठगी करते हैं ये लोग ,,,!!" फुसफुसाते हुए निधि ने कहा..


" नई मैडम... पूजा के सामान में हम लोग प्रॉफिट नहीं लेते,, एकदम हिसाब से ही पैकेट बना है... देखो नारियल ही 20 का होता है फिर साथ में फ़ूल, चूनर,अगरबत्ती..और इसमे इलायची दाना भी तो है..! " शायद उस महिला ने निधि की फुसफुसाहट को समझ कर ही तुरंत प्रतिउत्तर दिया.... 


" हाँ.. हाँ ठीक है.. कितने ईमानदार हो पता है.." कहते हुए निधि ने इक्यावन रुपये वाला पैकेट लिया और मंदिर के अंदर चली गयी वहाँ पर उसने देखा दर्शन के लिए लंबी लाइन लगी है, लेकिन आज जितना भी समय लगे उसे दर्शन तो करना ही था , क्योंकि दुबारा  इतने दूर आना मुश्क़िल ही है, और इसीलिए ही तो आज उसने ऑफ़िस से छुट्टी भी ली है .... I


और अब थोड़ी देर बाद उसने ध्यान दिया लाइन में खड़ी उसके सामने वाली दो महिलाएँ आपस में बात कर रहीं थीं " नैना तुमने कहाँ से लिया नारियल पैकेट..?" 


"मंदिर के सामने जो नारियल वाली बैठी है उससे... क्यों क्या हुआ,,?" 


" अरे वो न... हमारे घर के पास ही रहती है, उसके बेटे का छह महीने पहले इतना बड़ा एक्सीडेंट हो गया था, तब से ही वो बेचारा बिस्तर में पड़ा है, कमाने वाला घर में एक वही था, उसका पति तो पिछले साल ही नहीं रहा... वो जो कुछ कमाती है न.. उससे ही उसका घर चलाना मुश्किल होता है,और इस बार तो वो बेटे के लिए माँ से मन्नत मांग कर, नारियल के हर पैकेट के साथ चूनर भी फ्री में दे रही है...! "


ये सुनते ही निधि का दिल अचानक ज़ोरों से धड़कने लगा, और अब तो वो माता जी के दर्शन के बग़ैर ही लाइन से बाहर निकल गयी... ये देखकर लाईन में खड़ी महिलाएँ निधि से कहने लगीं -" आपका नंबर तो आने ही वाला है, आप कहाँ जा रही हैं..? "


तो हड़बड़ाते हुए घबराकर निधि उनसे बोली - " कुछ छूट गया है मेरा बाहर, वहाँ से आकर ही दर्शन करुँगी, वरना माँ का दर्शन अधूरा ही रह जायेगा... और अब जाते जाते ही वो सोचने लगी..." अंजाने में ही आज तो मैं एक माँ की श्रद्धा का अपमान करने जा रही थी... और अब तेज़ कदमों के साथ उस दुकान वाली महिला के पास पहुँची और उसे पाँच सौ रुपए का नोट पकड़ाते हुए बोली -" प्लीज़ माता जी आप इसे रख लो... मना नहीं करना... ...!" 


"नहीं मैडम, मैं बिना मेहनत के किसी से पैसे नहीं लेती.. जितना भी मिल जाता है बस उसी से हम लोग " वो आगे कुछ कहती इसके पूर्व ही निधि ने उससे मनुहार करते हुए कहा - " माताजी, ये मेरी तरफ से प्रसाद के रूप में ही ले लो.... ये दान नहीं एक माँ,दूसरी माँ को अपनी श्रद्धा से दे रही है.. " कहते हुए निधि के होंठ थर्राने लगे...ये देखकर... तत्क्षण,,, दोनों ही माँ की आँखें अब आँसू और ममता से भीग रही थी .. तभी मंदिर में मंत्र गूँजा..."""" या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

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