जय माता की
जय माता की
माँ के भक्त
की कथा
ब्रह्ममुहूर्त का समय था ।
माँ के एक साधक गंगा
जी में कमर तक डूबे
जप कर रहे थे ।
तभी उधर से एक राजा
का रथ निकला
। उस बाहुबली
ने मजाक में
इनसे पूछा -
" महाराज , आप कब से गंगा
जी की तली को देखे
जा रहे हैं
; बताइए तो , गंगा
जी की तली में क्या
होगा ?"
महाराज ने
बस कह ही दिया, " गंगा जी की तली
में ? ... गंगा जी
की तली में ... खरगोश होगा
और क्या !"
वह राजा
तो श्रद्धावश महाराज
जी को कुछ दक्षिणा देने की सोच रहा
था , उल्टी बात
सुनकर वह पिनक गया ।
" महाजाल डालो
" ; वह गरजा
- " तीन बार ... अगर खरगोश
निकले तो महाराज
का घर भर दो ; न
निकले तो इस ऐंठ का
इनको फल चुकाना
होगा ।"
एक-दो
लोगों ने उस साधक को
संकेत किया कि वे विवाद
में न पड़ें और क्षमा
माँग लें ।
साधक जी
अपने वक्तव्य से
न हटे - " अब
कह दिया , तो
कह दिया ।"
जाल डाला
गया , कुछ न निकला ।
दूसरी बार जाल डाला गया
, फिर कुछ नहीं
निकला । बाहुबली
ने क्रोधित दृष्टि
से सुदर्शन जी
को देखा , साधक
जी के माथे पर शिकन
तक न थी -
" अभी तीसरी
बार बाकी है
, भाई " , वे मुस्कुरा
रहे थे ।
क्रोध में
जल रहे राजा
ने आदेश दिया -
" डालो जाल
डालो , एक आखिरी
बार और ... ।"
जाल डाला
गया । जाल बाहर निकला तो
सबों ने हैरत से देखा
- जाल में दो जीवित खरगोश
थे ।
भय से
काँपता राजा उस साधक के
चरणों में गिर गया
- " आप सिद्ध
पुरुष हैं । मुझ मूर्ख
को माफ कर दो , महाराज
।"
वह अपने
लोगों की तरफ घूमा
- " गुरु जी के साथ
जाओ । जो भी आदेश
करें , वह व्यवस्था
करके ही लौटना
।"
साधक
जी मुस्कुराते हुए
बोले -
" तू हमारी व्यवस्था
क्या करेगा ! हमारी
व्यवस्था करने के
लिये माँ हैं । तू
अपनी राह जा ,
हम अपनी राह
चले ।"
काशी की
सँकरी गलियों में
साधक अपने
घर की ओर जा रहे
थे कि उन्हें
एक थप्पड़ लगा
। वे अकचकाकर
खड़े हो गये ।
सामने
एक अनिंद्य सुन्दरी
किशोरी खड़ी थी -
" तू जनम भर
पागल ही रहेगा
क्या रे !
" ... वह हँसी
और साधक जी मंत्रमुग्ध उसे देखते
रह गये ; " कुछ और
न सूझा तुझे
कहने को ? ... खरगोश
ही सूझा ! ...
देख तो , चुनार
के जंगल की कँटीली झाड़ियों
में खरगोश ढूँढ़ते
, पकड़ते मेरी चुन्नी
तो फटी ही ,
हथेलियों से खून
निकल आया ।
" किशोरी
ने अपनी दोनों
रक्त सनी हथेलियाँ
उनके आगे कर दी ।
साधक जी
की आँखों से
आँसुओं की धार बह निकली -
" क्षमा कर दो
, माँ । अपने इस मूर्ख
, नालायक और उजड्ड
पुत्र को क्षमा
कर दो ।"
... और
वे भगवती के
चरणों पर गिर पड़े ।
अपने भक्तों की
बात कही गिरने
नहीं देती माँ,

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